अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से
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एक बालकविता
प्रस्तुत कर रहा हूँ-
"आम डाल के"
आम पेड़ पर लटक रहे हैं।
पक जाने पर टपक रहे हैं।।
हरे वही हैं जो कच्चे हैं।
जो पीले हैं वो पक्के हैं।।
इनमें था जो सबसे तगड़ा।
उसे हाथ में मैंने पकड़ा।।
अपनी बगिया गदराई है।
आमों की बहार आई है।।
मीठे होते आम डाल के।
बासी होते आम पाल के।।
प्राची खुश होकर के बोली।
बाबा इनसे भर लो झोली।।
चूस रहे खुश होकर बच्चे।
आम डाल के लगते अच्छे।।
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Monday, August 5, 2013
"आम डाल के-अपनी बालकृति-हँसता गाता बचपन से" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')
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