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अब हरियाली तीज आ रही,
मम्मी मैं झूलूँगी झूला।
देख फुहारों को बारिश की,
मेरा मन खुशियों से फूला।।
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कई पुरानी भद्दी साड़ी,
बहुत आपके पास पड़ी हैं।
इतने दिन से इन पर ही तो,
मम्मी मेरी नजर गड़ी हैं।।
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इन्हें ऐंठकर रस्सी बुन दो,
मेरा झूला बन जाएगा।
मैं बैठूँगी बहुत शान से,
भइया मुझे झुलायेगा।।
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Friday, July 24, 2020
बालकविता "हरियाली तीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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हरियाली तीज
Saturday, July 5, 2014
"मैं भी जागा, तुम भी जागो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से

बालकविता
"मैं भी जागा, तुम भी जागो"
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मैं भी जागा
Wednesday, June 11, 2014
"कच्चे घर अच्छे रहते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से

बालकविता
"
"
कच्चे घर अच्छे रहते हैं
सुन्दर-सुन्दर सबसे न्यारा।
प्राची का घर सबसे प्यारा।।
खुला-खुला सा नील गगन है।
हरा-भरा फैला आँगन है।।
पेड़ों की छाया सुखदायी।
सूरज ने किरणें चमकाई।।
कल-कल का है नाद सुनाती।
निर्मल नदिया बहती जाती।।
तन-मन खुशियों से भर जाता।
यहाँ प्रदूषण नहीं सताता।।
लोग पुराने यह कहते हैं।
कच्चे घर अच्छे रहते हैं।।
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हँसता गाता बचपन
Monday, June 2, 2014
"सुराही" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से

बालकविता
"सुराही"
"

पानी को ठण्डा रखती है,
मिट्टी से है बनी सुराही।
बिजली के बिन चलती जाती,
देशी फ्रिज होती सुखदायी।।
छोटी-बड़ी और दरम्यानी,
सजी हुई हैं सड़क किनारे।
शीतल जल यदि पीना चाहो,
ले जाओ सस्ते में प्यारे।।
इसमें भरा हुआ सादा जल,
अमृत जैसा गुणकारी है।
प्यास सभी की हर लेता है,
निकट न आती बीमारी है।।
अगर कभी बाहर हो जाना,
साथ सुराही लेकर जाना।
घर में भी औ' दफ्तर में भी,
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सुराही,
हँसता गाता बचपन
Sunday, May 18, 2014
"बालकविता-सूअर का बच्चा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"हँसता गाता बचपन" से
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बालकविता
"सूअर का बच्चा"
गोरा-चिट्टा कितना अच्छा।
लेकिन हूँ सूअर का बच्चा।।
लोग स्वयं को साफ समझते।
लेकिन मुझको गन्दा कहते।।
मेरी बात सुनो इन्सानों।
मत अपने को पावन मानों।।
भरी हुई सबके कोटर में।
तीन किलो गन्दगी उदर में।।
श्रेष्ठ योनि के हे नादानों।
सुनलो धरती के भगवानों।।
तुम मुझको चट कर जाते हो।
खुद को मानव बतलाते हो।।
भेद-भाव मुझको नहीं आता।
मेरा दुनिया भर से नाता।।
ऊपर वाले की है माया।
मुझे मिली है सुन्दर काया।।
साफ सफाई करता बेहतर।
मैं हूँ दुनियाभर का मेहतर।।
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हँसता गाता बचपन
Wednesday, May 14, 2014
"आओ अब हम झूला झूलें" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"हँसता गाता बचपन" से
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बालकविता
"झूला झूलें"
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Posted by रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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Saturday, May 10, 2014
"माँ को नमन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से ![]()
माँ को नमन करते हुए!
आज यह बालकविता पोस्ट कर रहा हूँ!
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हँसता गाता बचपन
Tuesday, May 6, 2014
"बालकविता-मैना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से ![]()
"मैना"
मैं तुमको मैना कहता हूँ,
लेकिन तुम हो गुरगल जैसी। तुम गाती हो कर्कश सुर में, क्या मैना होती है ऐसी??
सुन्दर तन पाया है तुमने,
लेकिन बहुत घमण्डी हो।
नहीं जानती प्रीत-रीत को,
तुम चिड़िया उदण्डी हो।।
जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर,
तुम आगे को बढ़ती हो।
अपनी सखी-सहेली से तुम,
सौतन जैसी लड़ती हो।।
लड़कर मार भगाती हो। प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी, तुम बहुत सताती हो।। मीठी बोली से ही तो, मन का उपवन खिलता है। अच्छे-अच्छे कामों से ही, जग में यश मिलता है।। बैर-भाव को तजकर ही तो, अच्छे तुम कहलाओगे। मधुर वचन बोलोगे तो, सबके प्यारे बन जाओगे।। |
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Friday, May 2, 2014
"खरगोश" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से ![]()
"खरगोश"
रूई जैसा कोमल-कोमल,
लगता कितना प्यारा है।
बड़े-बड़े कानों वाला,
सुन्दर खरगोश हमारा है।।
बहुत प्यार से मैं इसको,
गोदी में बैठाता हूँ।
बागीचे की हरी घास,
मैं इसको रोज खिलाता हूँ।।
मस्ती में भरकर यह
लम्बी-लम्बी दौड़ लगाता है।
उछल-कूद करता-करता,
जब थोड़ा सा थक जाता है।।
तब यह उपवन की झाड़ी में,
छिप कर कुछ सुस्ताता है।
ताज़ादम हो करके ही,
मेरे आँगन में आता है।।
नित्य-नियम से सुबह-सवेरे,
यह घूमने जाता है।
जल्दी उठने की यह प्राणी,
सीख हमें दे जाता है।।
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हँसता गाता बचपन
Monday, April 28, 2014
"तख्ती और स्लेट" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से ![]()
तख्ती और स्लेट
सिसक-सिसक कर स्लेट
जी रही,
तख्ती ने दम तोड़
दिया है।
सुन्दर लेख-सुलेख
नहीं है,
कलम टाट का छोड़
दिया है।।
दादी कहती एक कहानी,
बीत गई सभ्यता
पुरानी।
लकड़ी की पाटी होती
थी,
बची न उसकी कोई
निशानी।
फाउण्टेन-पेन गायब
हैं,
जेल पेन फल-फूल रहे
हैं।
रीत पुरानी भूल रहे
हैं,
नवयुग में सब झूल
रहे हैं।।
समीकरण सब बदल गये
हैं,
शिक्षा का पिट गया
दिवाला।
बिगड़ गये परिवेश
प्रीत के,
बिखर गई है मंजुल
माला।।
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Sunday, April 20, 2014
"फोटो फीचर-बिजली कड़की पानी आया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अपनी बालकृति
"हँसता गाता बचपन" से

"बिजली कड़की पानी आया"
उमड़-घुमड़ कर बादल आये।
घटाटोप अँधियारा लाये।।
काँव-काँव कौआ चिल्लाया।
लू-गरमी का हुआ सफाया।।
मोटी जल की बूँदें आईं।
आँधी-ओले संग में लाईं।।
धरती का सन्ताप मिटाया।
बिजली कड़की पानी आया।।
लगता है हमको अब ऐसा।
ग्रीष्म बना चौमासा जैसा।।

पेड़ों पर लीची हैं झूली।
बगिया में अमिया भी फूली।।

आम और लीची घर लाओ।
जमकर खाओ, मौज मनाओ।।
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Wednesday, April 16, 2014
"रंग-बिरंगे छाते" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अपनी बालकृति "हँसता गाता बचपन" से

धूप और बारिश से,
जो हमको हैं सदा बचाते।
छाया देने वाले ही तो,
कहलाए जाते हैं छाते।।
जो हमको हैं सदा बचाते।
छाया देने वाले ही तो,
कहलाए जाते हैं छाते।।
आसमान में जब घन छाते,
तब ये हाथों में हैं आते।
रंग-बिरंगे छाते ही तो,
हम बच्चों के मन को भाते।।
तभी अचानक आसमान से,
मोटी-मोटी बूँदें आई।
प्रांजल ने उतार खूँटी से,
छतरी खोली और लगाई।।
मोटी-मोटी बूँदें आई।
प्रांजल ने उतार खूँटी से,
छतरी खोली और लगाई।।
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