धक्का-मुक्की रेलम-पेल। छुक-छुक करती आयी रेल।। इंजन चलता सबसे आगे। पीछे -पीछे डिब्बे भागे।। हार्न बजाता, धुआँ छोड़ता। पटरी पर यह तेज दौड़ता।। जब स्टेशन आ जाता है। सिग्नल पर यह रुक जाता है।। जब तक बत्ती लाल रहेगी। इसकी जीरो चाल रहेगी।। हरा रंग जब हो जाता है। तब आगे को बढ़ जाता है।। बच्चों को यह बहुत सुहाती। नानी के घर तक ले जाती।। सबके मन को भाई रेल। आओ मिल कर खेलें खेल।। धक्का-मुक्की रेलम-पेल। छुक-छुक करती आयी रेल।। |
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Thursday, February 16, 2012
"छुक-छुक करती आयी रेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
Saturday, February 11, 2012
"भगवान एक है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे। भक्तों को लगते हैं प्यारे।। हिन्दू मन्दिर में हैं जाते। देवताओं को शीश नवाते।। ईसाई गिरजाघर जाते। दीन-दलित को गले लगाते।। जहाँ इमाम नमाज पढ़ाता। मस्जिद उसे पुकारा जाता।। सिक्खों को प्यारे गुरूद्वारे। मत्था वहाँ टिकाते सारे।। राहें सबकी अलग-अलग हैं। पर सबके अरमान नेक है। नाम अलग हैं, पन्थ भिन्न हैं। पर जग में भगवान एक है।। |
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भगवान एक है
Friday, February 3, 2012
‘‘गुन-गुन करता भँवरा आया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गुन-गुन करता भँवरा आया। कलियों फूलों पर मंडराया।। यह गुंजन करता उपवन में। गीत सुनाता है गुंजन में।। कितना काला इसका तन है। किन्तु बड़ा ही उजला मन है। जामुन जैसी शोभा न्यारी। खुशबू इसको लगती प्यारी।। यह फूलों का रस पीता है। मीठा रस पीकर जीता है।। |
Sunday, January 22, 2012
"विद्यालय में मुझको भी जाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो। क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी, गिनती भी बतला दो।। पढ़ लिख कर मैं, मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी। दुनिया भर में, बापू जैसा अपना नाम करूँगी।। रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे, मैं भी उठा करूँगी। पुस्तक लेकर पढ़ने में, मैं संग में जुटा करूँगी।। बस्ता लेकर विद्यालय में, मुझको भी जाना है। इण्टरवल में टिफन खोल कर, खाना भी खाना है।। छुट्टी में गुड़िया को, ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी। उसके लिए पेंसिल और, इक कापी भी लाऊँगी।। |
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Friday, January 20, 2012
"देहरादून नगर बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
पापा की लग गई नौकरी, देहरादून नगर बाबा। कैसे भूलें प्यार आपका, नहीं सूझता कुछ बाबा।। छोटा घर है, नया नगर है, सर्द हवा चलती सर-सर है, बन जायेंगे नये दोस्त भी, अभी अकेले हैं बाबा। प्यारे चाचा-दादी जी की, हमको याद सताती है, विद्यालय की पीली बस भी, गलियों में नहीं आती है, भीड़ बहुत है इस नगरी में, मँहगाई भी है बाबा। आप हमारे लिए रोज ही, रचनाएँ रच देते हो, बच्चों के मन की बातों को, सहज भाव से कहते हो, ब्लॉग आपका बिना नेट के, कैसे हम देखें बाबा। छोटी बहना प्राची को तो, बाबा-दादी प्यारी थी, छोटी होने के कारण वो, सबकी बहुत दुलारी थी। बहुत अकेली सहमी सी है, गुड़िया रानी जी बाबा। गर्मी की छुट्टी होते ही, अपने घर हम आयेंगे, जो भी लिखा आपने बाबा, पढ़कर वो हम गायेंगे, जब भी हो अवकाश आपको, मिलने आना तुम बाबा। |
Monday, January 9, 2012
"तितली रानी कितनी सुन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मन को बहुत लुभाने वाली, तितली रानी कितनी सुन्दर। भरा हुआ इसके पंखों में, रंगों का है एक समन्दर।। उपवन में मंडराती रहती, फूलों का रस पी जाती है। अपना मोहक रूप दिखाने, यह मेरे घर भी आती है।। भोली-भाली और सलोनी, यह जब लगती है सुस्ताने। इसे देख कर एक छिपकली, आ जाती है इसको खाने।। आहट पाते ही यह उड़ कर, बैठ गयी चौखट के ऊपर। मेरा मन भी ललचाया है, मैं भी देखूँ इसको छूकर।। इसके रंग-बिरंगे कपड़े, होली की हैं याद दिलाते। सजी धजी दुल्हन को पाकर, |
Wednesday, December 21, 2011
"सबके प्यारे बन जाओगे?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सुन्दर तन पाया है तुमने, लेकिन बहुत घमण्डी हो। नहीं जानती प्रीत-रीत को, तुम चिड़िया उदण्डी हो।। जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर, तुम आगे को बढ़ती हो। अपनी सखी-सहेली से तुम, सौतन जैसी लड़ती हो।। भोली-भाली चिड़ियों को तुम, लड़कर मार भगाती हो। प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी, तुम बहुत सताती हो।। मीठी बोली से ही तो, मन का उपवन खिलता है। अच्छे-अच्छे कामों से ही, जग में यश मिलता है।। बैर-भाव को तजकर ही तो, अच्छे तुम कहलाओगे। मधुर वचन बोलोगे तो, सबके प्यारे बन जाओगे।। |
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