समर्थक

Thursday, July 18, 2013

“हँसता गाता बचपन की भूमिका और शीर्षक गीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


“हँसता गाता बचपन”
की भूमिका और
शीर्षक गीत
हँसता-खिलता जैसा,
इन प्यारे सुमनों का मन है।
गुब्बारों सा नाजुक,
सारे बच्चों का जीवन है।।

नन्हें-मुन्नों के मन को,
मत ठेस कभी पहुँचाना।
नित्यप्रति कोमल पौधों पर,
स्नेह-सुधा बरसाना ।।

ये कोरे कागज के जैसे,
होते भोले-भाले।
इन नटखट गुड्डे-गुड़ियों के,
होते खेल निराले।।

भरा हुआ चंचल अखियों में,
कितना अपनापन है।
झूम-झूम कर मस्ती में,
हँसता-गाता बचपन है।।
 --
भूमिका  (डॉ.राष्ट्रबन्धु)
     डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक की लेखनी कविताओं के साथ-साथ बाल साहित्य में भी समान रूप से चलती है।मुझे इनकी पहली कृति नन्हे सुमन भी देखने का सौभाग्य मिला है और आज मुझे इनकी दूसरी बाल कृति हँसता गाता बचपन की भूमिका लिखने का अवसर मिला है।
    हँसता गाता बचपन भी नन्हे सुमन की ही भाँति श्रेष्ठ और आशाप्रद है। इसमें शास्त्रीयता की दृष्टि से छन्दों, रसों और वैज्ञानिकता का परिपालन किया गया है। जिससे उनके लेखन से आशाएँ उभरती हैं। आधुनिक विषयों पर मयंक जी अपनी लेखनी का जादू हमेशा शब्दों के माध्यम से बिखेरते हैं। मेरे विचार से इनके द्वारा वेबकैमपर हिन्दी में प्रकाशित पहली बाल रचना है।
“वेब कैम की शान निराली।
करता घरभर की रखवाली।।...
नवयुग की यह है पहचान।
वेबकैम है बहुत महान।।...”
    हँसता गाता बचपन एक ऐसी कृति है जिसमें प्राकृतिक परिवेश और बच्चों के वातावरण तथा बाल साहित्य की उद्देश्यपरक सम्भावनाएँ प्रकट होती हैं।
    इस कृति की प्रथम रचना वन्दना मॆं उन्होंने कामना की है-
“अन्धकार को दूर भगायें।
मन मन्दिर में दीप जलायें।।
जागो अब हो गया सवेरा।
दूर हो गया तम का डेरा।।
सिक्षा की हम अलख जगायें।
मन मन्दिर में दीप जलायें...।।“
    साथ ही शीर्षक गीत में तो इन्होंने कमाल ही किया है-
“हँसता-खिलता जैसा,
इन प्यारे सुमनों का मन है।
गुब्बारों सा नाज़ुक,
सारे बच्चों का जीवन है।।
नन्हें-मुन्नों के मन को,
मत ठेस कभी पहुँचाना।
इन कोमल पौधों पर,
अपना स्नेह-सुधा बरसाना।।
ये कोरे कागज़ के जैसे,
होते भोले-भाले।
इन नटखट गुड्डे-गुड़ियों के,
होते खेल निराले।।
भरा हुआ चंचल अँखियों में,
कितना अपनापन है।
झूम-झूमकर मस्ती में,
हँसता गाता बचपन है।।“
    इस बालकृति में स्वागत गान के रूप में प्रस्तुत रचना तो उनकी कालजयी रचना है-
“स्वागतम आपका कर रहा रहा हर सुमन।
आप आये यहाँ आपको शत् नमन।।
भक्त को मिल गये देव बिन जाप से,
धन्य शिक्षासदन हो गया आपसे,
आपके साथ आया सुगन्धित पवन।
--
अपने आशीष से धन्य कर दो हमें,
देश को दें दिशा ऐसा वर दो हमें,
अपने कृत्यों से लायें वतन में अमन।...”
    इसके अतिरिक्त श्यामपट, स्लेट और तख़्ती, थाली के बैंगन, कद्दू, देशी फ्रिज, शहतूत, भैंस, कौआ, बिच्छू आदि बालरचनाओं के ऐसे विषय हैं, जिन पर कलम चलाना आदरणीय मयंक जी के ही बस की बात है।
    मैंने इस कृति की पाण्डुलिपि  को पढ़कर यह अनुभव किया है कि शास्त्री जी ने अपनी रचना का विषय चाहे जो भी चुना हो, मगर उसमें एक सन्देश बच्चों के लिए अवश्य निहित होता है।
   “मैना” पर लिखी गयी उनकी इस रचना को ही लीजिए-
“मैं तुमको चिड़िया कहता हूँ,
लेकिन तुम हो मैना जैसी।
तुम गाती हो कर्कस सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी।।
और इसके आगे लिखते हैं-
“मीटी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।
बैर-भाव को तज कर ही तो,
तुम अच्छे कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।...”
     इस प्रकार हम देखते हैं कि मयंक जी ने भाषिक सौन्दर्य के अतिरिक्त बाल साहित्य की सभी विशेषताओं का संग-साथ लेकर जो निर्वहन किया है, वह अत्यन्त सराहनीय है।
    मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चे मयंक जी के बाल साहित्य से अवस्य लाभान्वित होंगे और उनकी यह कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
दुर्गाष्टमी, सम्वत् -२०६८
(डॉ. राष्ट्रबन्धु)
सम्पादक-बाल साहित्य समीक्षा
109 / 309, राम कृष्ण नगर,
कानपुर (उत्तर प्रदेश) 208 012

Tuesday, January 1, 2013

“उड़ते पंख पसार!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नीला नभ जिनका संसार। 
वो उड़ते हैं पंख पसार।। 
GO8F7402copyLarge2
जब कोई भी थक जाता है। 
वो डाली पर सुस्ताता है।।
तोता पेड़ों का बासिन्दा। 
कहलाता आजाद परिन्दा।। 
Parrot-BN_MR7817-w
खाने का सामान धरा है। 
पर मन में अवसाद भरा है।। 
लोहे का हो या कंचन का। 
बन्धन दोनों में तन मन का।। 
parrot_2
अत्याचार कभी मत करना। 
मत इसको पिंजडे में धरना।। 
कारावास बहुत दुखदायी। 
जेल नहीं होती सुखदायी।। 
tota
मत देना इसको अवसाद। 
करना तोते को आज़ाद।। 
(चित्र गूगल छवियों से साभार)

Friday, November 23, 2012

"सबके मन को बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।

काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।
नागफनी की शैया पर भी,
ये हँसते-खिलते जाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।। 
सुन्दर सुन्दर गुल गुलाब के,
सारा उपवन महकाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।। 
नीम्बू की कण्टक शाखा पर,
सुरभित होकर बलखाते हैं। 
सबके मन को बहलाते हैं।।  
काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।

Thursday, October 25, 2012

"प्रभू पंख दे देना सुन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज फेसबुक पर
डॉ. प्रीत अरोरा जी का यह चित्र देखा
तो बालगीत रचने से
अपने को न रोक सका!
काश् हमारे भी पर होते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

पल में दूर देश में जाते,
नानी जी के घर हो आते,
कलाबाजियाँ करते होते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

चढ़े भाव हैं आज दूध के,
बिलख रहे हम बिना दूध के.
मिलावटी से सेहत खोते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

काश् हमें खग प्रभू बनाते,
ताजे-ताजे फल हम खाते,
भाग्यवान होते हैं तोते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

हमको भी प्रभु हंस बनाना,
सारे गुण हमको सिखलाना,
शुद्ध दूध के लिए न रोते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

जायेंगे हम पार समन्दर,
प्रभू पंख दे देना सुन्दर,
हम भी चिट्ठी ढोते होते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

Thursday, May 24, 2012

"कूलर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

ठण्डी-ठण्डी हवा खिलाये।
इसी लिए कूलर कहलाये।।

जब जाड़ा कम हो जाता है।
होली का मौसम आता है।।

फिर चलतीं हैं गर्म हवाएँ।
यही हवाएँ लू कहलायें।।

तब यह बक्सा बड़े काम का।
सुख देता है परम धाम का।।

कूलर गर्मी हर लेता है।
कमरा ठण्डा कर देता है।।

चाहे घर हो या हो दफ्तर।
सजा हुआ यह हर खिड़की पर।।

इसकी महिमा अपरम्पार।
यह ठण्डक का है भण्डार।।

Sunday, March 4, 2012

"रंग-बिरंगी आई होली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आयी होली, आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।
मुन्नी आओ, चुन्नी आओ,
रंग भरी पिचकारी लाओ,
मिल-जुल कर खेलेंगे होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
मठरी खाओ, गुँजिया खाओ,
पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,
मस्ती लेकर आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
रंगों की बौछार कहीं है,
ठण्डे जल की धार कहीं है,
भीग रही टोली की टोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
परसों विद्यालय जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
मेहनत से पढ़ना हमजोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

Wednesday, February 22, 2012

"मुझको दो वरदान प्रभू!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

pranjal copy
मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।

मुझे कार में बैठाकर,
वो रोज घुमाने जाते हैं।
पापा जी मेरी खातिर,
कुछ नये खिलौने लाते हैं।।
मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,
वो फूले नही समाते हैं।
जग के स्वप्न सलोने,
उनकी आँखों में छा जाते हैं।।
ममता की मूरत मम्मी-जी,
पापा-जी प्यारे-प्यारे।
मेरे दादा-दादी जी भी,
हैं सारे जग से न्यारे।।
सपनों में सबके ही,
सुख-संसार समाया रहता है।
हँसने-मुस्काने वाला,
परिवार समाया रहता है।।
मुझको पाकर सबने पाली हैं,
नूतन अभिलाषाएँ।
क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,
उनकी सारी आशाएँ।।
मुझको दो वरदान प्रभू!
मैं सबका ऊँचा नाम करूँ।
मानवता के लिए जगत में,
अच्छे-अच्छे काम करूँ।।