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Friday, January 20, 2012

"देहरादून नगर बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पापा की लग गई नौकरी,
देहरादून नगर बाबा।
कैसे भूलें प्यार आपका,
नहीं सूझता कुछ बाबा।।

छोटा घर है, नया नगर है,
सर्द हवा चलती सर-सर है,
बन जायेंगे नये दोस्त भी,
अभी अकेले हैं बाबा।

प्यारे चाचा-दादी जी की,
हमको याद सताती है,
विद्यालय की पीली बस भी,
गलियों में नहीं आती है,
भीड़ बहुत है इस नगरी में,
मँहगाई भी है बाबा।

आप हमारे लिए रोज ही,
रचनाएँ रच देते हो,
बच्चों के मन की बातों को,
सहज भाव से कहते हो,
ब्लॉग आपका बिना नेट के,
कैसे हम देखें बाबा।

छोटी बहना प्राची को तो,
बाबा-दादी प्यारी थी,
छोटी होने के कारण वो,
सबकी बहुत दुलारी थी।
बहुत अकेली सहमी सी है,
गुड़िया रानी जी बाबा।
गर्मी की छुट्टी होते ही,
अपने घर हम आयेंगे,
जो भी लिखा आपने बाबा,
पढ़कर वो हम गायेंगे,
जब भी हो अवकाश आपको,
मिलने आना तुम बाबा।

3 comments:

  1. bachchon ke maadhyam se apne dil ke bhaavon ko bahut sundar chitrit kiya hai.bachche jab door jaate hain dada dadi ya nana nani ke man ki vyatha mujh se achchi kaun samajh sakta hai.mere bachche ek maheene bad aaj hi lauten hain kashmir se unke bina mera bhi yahi haal tha.

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  2. sunder rachna....ek dam sahi likha naya shahar naya parivesh khud ko dhaalna...bahut mushkil
    पापा का मन नही लगता
    नये शहर मे ए बाबा
    याद हैं बस प्यार आपका
    नये शहर मे ए बाबा

    दोस्त नये बन गये हैं लेकिन
    ड्राइंग रूम तक आते हैं
    अपने शहर मे तो हम
    रज़ाई मे बतियाते थे
    प्यार सबका नक़ली लगता
    नये शहर मे ए बाबा

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  3. छोटी बहना प्राची को तो,
    बाबा-दादी प्यारी थी,
    छोटी होने के कारण वो,
    सबकी बहुत दुलारी थी।
    बहुत अकेली सहमी सी है,
    गुड़िया रानी जी बाबा।

    बहुत ही प्यारी और सुन्दर रचना ..

    ReplyDelete

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