समर्थक

Thursday, April 24, 2014

"भैंस हमारी बहुत निराली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अपनी बालकृति "हँसता गाता बचपन" से
"भैंस हमारी बहुत निराली"
 भैंस हमारी बहुत निराली।

खाकर करती रोज जुगाली।।

इसका बच्चा बहुत सलोना।
प्यारा सा है एक खिलौना।।

बाबा जी इसको टहलाते।
गर्मी में इसको नहलाते।।

गोबर रोज उठाती अम्मा।
सानी इसे खिलाती अम्मा।

गोबर की हम खाद बनाते।
खेतों में सोना उपजाते।।

भूसा-खल और चोकर खाती।
सुबह-शाम आवाज लगाती।।

कहती दूध निकालो आकर।
धन्य हुए हम इसको पाकर।।

सीधी-सादी, भोली-भाली।
लगती सुन्दर हमको काली।।

6 comments:

  1. बहुत सुंदर कविता...आभार सर! आनंद आ गया।

    ReplyDelete
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (25.04.2014) को "चल रास्ते बदल लें " (चर्चा अंक-1593)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    ReplyDelete
  3. वाह वाह ...बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
  4. अभी बियाई दिख रही है.. .
    भैंस और उसका बच्चा बहुत अच्छा लगा
    बच्चा किसी भी जीव-जंतु का हो या इंसान का बहुत प्यारा होता है। .

    ReplyDelete

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।