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Monday, August 12, 2013

"टर्र-टर्र टर्राने वाला" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

अपनी बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
एक बालकविता
प्रस्तुत कर रहा हूँ-
"टर्र-टर्र टर्राने वाला"
टर्र-टर्र चिल्लाने वाला!
मेंढक लाला बहुत निराला!!
कभी कुमुद के नीचे छिपता,
और कभी ऊपर आ जाता,
जल-थल दोनों में ही रहता,
तभी उभयचर है कहलाता,
पल-पल रंग बदलने वाला!
मेंढक लाला बहुत निराला!!
लगता है यह बहुत भयानक,
किन्तु बहुत है सीधा-सादा,
अगर जरा भी आहट होती,
झट से पानी में छिप जाता,
उभरी-उभरी आँखों वाला!
मेंढक लाला बहुत निराला!!
मुण्डी बाहर करके अपनी,
इधर-उधर को झाँक रहा है,
कीट-पतंगो को खाने को,
देखो कैसा ताँक रहा है,
उछल-उछल कर चलने वाला!
मेंढक लाला बहुत निराला!!
(छायांकनःडॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

4 comments:

  1. वाह .....मेंढक महाशय तो सचमुच निराले हैं

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  2. बहुत सुन्दर बाल कविता ..आजकल तो मेंढक लाला की बहार आयी है ...

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  3. बेहतरीन बाल कविता ..पढ़ कर आनंद आ गया ..

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