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Monday, July 22, 2013

"मन मन्दिर में दीप जलाएँ " (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

माँ की आराधना
अपनी बालकृति "हँसता गाता बचपन" से
अन्धकार को दूर भगाएँ
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।
जागो अब हो गया सवेरा,
दूर हो गया तम का घेरा,
शिक्षा की हम अलख जगाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

कुक्कुट कुकड़ूँकू चिल्लाया,
चिड़ियों ने भी गीत सुनाया,
आओ हम भी खिलकर गायें।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

घर-आँगन को आज बुहारें,
कभी न हिम्मत अपनी हारें,
जीने का ढंग हम सिखलाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

खिड़की दरवाजों को खोलें,
वेदों के मन्त्रों को बोलें,
पूजा के हम थाल सजाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

माता की आरती उतारें,
स्वर भरकर अर्चना उचारें,
ज्ञान-रश्मियों को फैलाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

5 comments:

  1. सादर नमन गुरुवर -
    सुन्दर प्रस्तुति-

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  2. खिड़की दरवाजों को खोलें,
    वेदों के मन्त्रों को बोलें,
    पूजा के हम थाल सजाएँ।
    मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

    बहुत सुंदर गीत...काश यह हमारे भीतर उतर जाए...
    शिक्षा की हम अलख जगाएँ।
    मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

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  3. ापने लिखा... हमने पढ़ा... और भी पढ़ें...इस लिये आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 26-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...


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  4. बहुत सुंदर कविता

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