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Thursday, September 5, 2013

"स्लेट और तख़्ती" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अपनी बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
एक बालकविता
"स्लेट और तख़्ती"
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सिसक-सिसक कर स्लेट जी रही,
तख्ती ने दम तोड़ दिया है।
सुन्दर लेख-सुलेख नहीं है,
कलम टाट का छोड़ दिया है।।

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दादी कहती यही कहानी,
बीत गई सभ्यता पुरानी,
लकड़ी की पाटी होती थी,
बची न उसकी कोई निशानी।। 

फाउण्टेन-पेन गायब हैं,
जेल पेन फल-फूल रहे हैं।
रीत पुरानी भूल रहे हैं,
नवयुग में सब झूल रहे हैं।। 

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 समीकरण सब बदल गये हैं,
शिक्षा का पिट गया दिवाला।
बिगड़ गये परिवेश ज्ञान के,
बिखर गई है मंजुल माला।।

3 comments:

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