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Friday, December 13, 2013

"लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अपनी बाल कृति 
"हँसता गाता बचपन" से
एक बालकविता
"लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे"
लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे,
नारंगी-से कितने सारे!

बच्चे इनको जमकर खाते,
लड्डू सबके मन को भाते!
pranjal_laddu2
प्रांजल का भी मन ललचाया,
लेकिन उसने एक उठाया!
prachi_laddu
अब प्राची ने मन में ठाना,
उसको हैं दो लड्डू खाना!

तुम भी खाओ, हम भी खाएँ,
लड्डू खाकर मौज़ मनाएँ!

4 comments:

  1. बढ़िया बाल कविता -
    सुन्दर कलेवा-
    आभार गुरुवर

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  2. बहुत सुन्दर रचना..
    लड्डू देख मुँह में पानी आ गया...
    :-)

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  3. अब प्राची ने मन में ठाना,
    उसको हैं दो लड्डू खाना!

    तुम भी खाओ, हम भी खाएँ,
    लड्डू खाकर मौज़ मनाएँ!
    बोल श्री लड्डू गोपाल
    जय लड्डू जय जय लड्डू

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